Gautam Buddha Ke Baare Mein Puri Jankari In Hindi

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दोस्तों आज हम आपको Gautam Buddha Ke Baare Mein Puri Jankari In Hindi के बारे में बताने जा रहे है|जो दार्शनिक,धर्मगुरु,समाज -सुधारक,बौद्ध धर्म के संस्थापक थे| इस Article मे आप गौतम बुद्ध की जीवनी , Gautam Buddha Ki Life Story , Jivan Parichay , Jivni Hindi Me ya Bhgwan Gautam Buddha Biography In Hindi पढ़ने को पाएंगे !

Gautam  Buddha Ke Baare Mein Puri Jankari In Hindi

बौद्ध धर्म के संस्थापक Gautam Buddha का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी ,नेपाल में हुआ था |इनके पिता का नाम शुद्धोधन था ,जो शाक्य राज्य कपिलवस्तु के शासक थे | इनकी माता का नाम माया देवी था |इनकी माता माया देवदह की राजकुमारी थी और कोलीय वंश से थी | एक बार रानी माया को रात में स्वप्न आया कि एक चमकता तारा स्वर्ग से  निकला जो पहले छह दांतों वाला एक हाथी देखा फिर वह हाथी सफेद गाय में बदल गया और वह आसमान से दाहिनी ओर से रानी के गर्भ में प्रवेश कर गया|रानी उसी रात गर्भवती हो गयी|रानी को अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हुआ|सुबह उठते रानी ने पूरा वृतांत राजा को सुनाया|

राजा ने एक स्वप्नवाचक को बुलाया और उन्होंने राजा से कहा कि ”स्वप्न उत्तम है कर्क और सूर्य की उत्तम योग से रानी एक सुन्दर ,स्वस्थ पुत्र को जन्म देंगी जो मानव कल्याण के लिए जन्म लेगा और मानव जाति को अज्ञानता की दासता से मुक्त करेगा| प्रसव काल आते ही रानी अपने पिता के पास जाने के लिए निकल पड़ी धीरे -धीरे दोपहर होने लगी रानी ने सोचा विश्राम कर लेते है| तभी उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और उन्हें एक सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई |कहते है की जन्म के बाद उस बालक ने सात कदम चले जहाँ जहाँ बालक के कदम पड़े धरती से कमल के फूल निकलने लगे|जन्म के समय बालक के तन पर 32 सुभ लक्षण अंकित थे | उधर कुछ अमंगलसूचक चिन्हों ने उन्हें परेशान कर रखा था स्वप्न देखने वालो ने उनकी चिंताओ को दूर करते हुए कहा कि राजकुमार इस धरती पर शासन करेगा|

राजकुमार सात रत्नों से विभूषित होंगे | जो इसप्रकार होंगे :-

पहला : चक्र-रत्न -ईश्वरप्रदत्त चक्र,

दूसरा : अश्व -रत्न -वह स्वाभिमानी अश्व जो बादलों पर भी यात्रा कर सकता है ,

तीसरा : हस्ति -रत्न -जो बर्फ के समान वह श्वेत गज जो मनुष्य को लेकर तेज गति से चलता है ,

चौथा : जन्म से ही धैर्यवान,

पाचवा : नीति जानने वाला,

छठा : दीवाकर की तरह अजेय ,

सातवाँ : स्त्री रत्न -जिसे अत्यंत सुन्दर स्त्री प्राप्त हो|

यह सुनकर राजा खुश हो गए|राजा ने पूरे नगर में उत्सव की घोषणा करवा दी |उसी उत्सव के सुभ मुहूर्त पर राजकुमार का नामकरण हुआ|और राजकुमार का नाम सिद्धार्थ रखा गया जिसका अर्थ है ”जिसका जन्म सिद्धी प्राप्ति के लिए हुआ हो |

Gautam Buddha Ke Baare Mein

उसी भीड़ में एक सफेद बालो वाले,महान ज्ञानी वृद्ध संत आसित भी आये जो से निकली आवाज को सुन सकते थे और उस आवाज का अर्थ समझ लेते थे |वे एक पीपल के नीचे ध्यान लगाये बैठे थे जब उन्हें बुद्ध के जन्म के बारे में पता चला तो वे उस बालक के दर्शन के लिए निकल पड़े |बालक को देखते ही उनके मुख से निकला कि यह बालक इस पूरे साम्राज्य का सम्राट बनेगा परन्तु मुझे खुशियों के साथ -साथ दुःख का आना भी दिख रहा है|उनके निकट आते ही राजा और रानी ने उन्हें देखकर शीश नवाया|उनके चरणों में अपने बालक को आशीर्वाद के लिए झुकायापर संत ने तत्काल पैरों को पीछे खीचते हुए कहा कि महरानी आप यह क्या कर रही है |राजा रानी संत को बड़े आश्चर्य से देखते रह गए कि गुरु आसित क्या कर रहे है महासंत ने उस बालक को साष्टांग प्रणाम किया|उनके चरण राज को माथे पर लगाकर कहा कि हे बालक मै जिसकी पूजा करता हूँ आप वही है| आप ही जगतारक बुद्ध है |

आपके दर्शन पाकर मै धन्य हो गया पर मेरे मन मै एक दुःख है कि मै आपकी अमृतवाणी को नहीं सुन पाउँगा|यह देह मृत्य है और मै यह नश्वर शरीर शीघ्र छोड़ने वाला हूँ |और रानी इस संसार में सिर्फ इस महान आत्मा को जन्म देने ही आई थी और इन्होने यह शुभ कार्य संपन्न कर दिया है |अब उनके भौतिक शरीर को सात दिनों के अन्दर मुक्ति मिल जायेगी|संत का यह कथन सत्य हुआ रानी ने सातवे दिन अपना शरीर त्याग दिया |इधर बालक का लालन -पालन महरानी की बहन और राजा की  दूसरी रानी महाप्रजापति गौतमी ने किया|सिद्धार्थ को अन्य बच्चो की तरह बचपन में खिलौनों से कोई लगाव नहीं था|

Gautam Buddha Ki Life Story

धीरे -धीरे सिद्धार्थ बड़े हुए| सिद्धार्थ बचपन से ही दयावान ,विनम्र थे| सिद्धार्थ बचपन से ही कोमल ह्रदय के थे, वे किसी को दुखी नहीं देख सकते थे|उनकी कई कहानियों से पता चलता है|एक बार सिद्धार्थ के चचेरे भाई देवदत्त ने एक हंस को अपने तीर से घायल कर दिया| वह हंस सिद्धार्थ को मिला| सिद्धार्थ और देवदत्त में हंस के लिए लड़ाई होने लगी |दोनों न्याय पाने के लिए राजा के पास गए |दोनों ने अपना- अपना किस्सा सुनाया राजा ने दोनों की बात सुनी अंत में राजा ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि मारने वाले से, बचाने वाले का अधिकार अधिक होता है इस लिए यह हंस सिद्दार्थ का है|इसप्रकार सिद्धार्थ ने हंस के प्राणों की रक्षा की|

सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र से शिक्षा-दीक्षा ली|साथ ही साथ गुरु विश्वामित्र से घुड़सवारी,तीर चलाना सिखाया,वेद और उपनिषद का ज्ञान दिया|सिद्धार्थ धीरे-धीरे बड़े होने लगे जब वे 16 साल के हुए तो उनका विवाह कोली वंश की राजकुमारी यशोधरा से हो गया|राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ का विवाह जल्दी इस लिए कर दिया था क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा संन्यासी बने| वह चाहते थे कि सिद्दार्थ उनका राजपाठ सभाले|यशोधरा ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया|उसका नाम राहुल रखा गया| राजा ने सिद्धार्थ के लिए सारी सुख सुविधाओ की व्यवस्था की |लेकिन सिद्धार्थ का मन इन सब चीजों में नहीं लगता|सिद्दार्थ बचपन से ही एकांत में रहते और वे सभी बच्चो के साथ नहीं खेलते थे उनका लगाव प्रकृति से ज्यादा था|राजा ने तीन महल बनवाये जो हर मौसम के लिए सही थे|सिद्धार्थ के चारों तरफ दास-दासियों का जमावड़ा लगा रहता था|लेकिन कहा जाता है जो भाग्य में लिखा होता है वह हो कर रहता है सिद्धार्थ का जन्म राजा बनने के लिए नहीं हुआ था |

Gautam Buddha Ka Jeevan Parichay

सिद्धार्थ ने एक बार अपने पिता से कहा कि पिता जी मै बाहर की दुनिया देखना चाहता हूँ ,मै अपनी प्रजा से मिलना चाहता हूँ|सिद्धार्थ के अधिक कहने पर राजा शुद्धोधन ने अनुमति दे दी|राजा ने मंत्री से कहा कि कल राजकुमार कपिलवस्तु की प्रजा से मिलने जायेगे इसलिए नगर में घोषणा करवा दो कि कल नगर में कोई दुखी व्यक्ति राजकुमार के सामने न आये|यह घोषणा पूरे नगर में फैला दी गई|अगली सुबह सिद्धार्थ सैर पर निकले ,पूरा नगर टहल आये देखा कि उनकी प्रजा सुखपूर्वक रह रही है और सभी राजा का अभिवादन कर रहे है पूरा नगर सजा हुआ था और सारे रास्ते भी सजाए गए|राजकुमार भी अपनी प्रजा को देख कर खुश थे |

राजकुमार ने सारथी चन्ना से कहा की मुझे नगर से थोडा आगे सैर करवाओ|नगर से थोडा आगे बढने पर एक वृद्ध ,जिसका शरीर अत्यंत कमजोर था और हाथ पैर चलने पर कॉप रहे थे राजकुमार ने उसे देखा  | उस वृद्ध के शरीर पर मैले-कुचेले चिथड़े लपेटे हुए थे|उसकी पीठ को देख कर उसकी उम्र को पता लगाया जा सकता था |राजकुमार ने सारथी से पूछा कि यह कौन है जो दिखने पर मनुष्य जैसा है परन्तु यह अत्यंत कमजोर ,गन्दा और गरीब है क्या संसार में ऐसे व्यक्ति भी जन्म लेते है|इस कथन का क्या मतलब है ”मै चार दिन ही रहूँगा ”| सारथी चन्ना ने कहा कि राजकुमार यह व्यक्ति वृद्ध है |राजकुमार ने फिर प्रश्न किया कि क्या सभी एक दिन वृद्ध होते है|चन्ना ने जवाब दिया की हाँ राजकुमार सभी मनुष्य को एक न एक दिन वृद्धावस्था से गुजरना पड़ता है |

फिर राजकुमार आगे बढते है आगे कुष्ठ रोग से पीड़ित मनुष्य दिखाई पड़ता है जो कुष्ठ रोग की पीड़ा से चिल्ला रहा था|राजकुमार यह देख कर दुखी थे|राजकुमार ने चन्ना से पूछा कि यह कौन है यह रो क्यों रहा है चन्ना ने जवाब दिया कि यह कुष्ठ रोग से पीड़ित है |और इसे पीड़ा हो रही है इसलिए यह रो रहा है|क्या यह सभी को होता है और क्या यह मुझे भी होगा|नहीं राजकुमार जरुरी नहीं यह रोग सभी को हो लेकिन मनुष्य अपने जीवनकाल में एक बार किसी न किसी रोग से ग्रसित अवश्य होता है|

उन्होंने चन्ना को आगे बढने का आदेश दिया|जैसे राजकुमार आगे थोड़ी दूर बढे ही थे वैसे उन्हें तभी कोलाहल सुनायी दिया|तब राजकुमार ने भीड़ को रोते -बिलखते सरिता तट की ओर ले जा रहे है |और सभी एक ही उच्चारण कर रहे है ”राम नाम सत्य है ”|मरने वाले को सभी पकडे हुए है मृतक के परिवार वाले ,मित्र ,बंधुगण सभी की आँखों में आँसू है |मृतक को सब बांस की अर्थी पर ले जा रहे है |सभी उसे तट के पास ले गए जहाँ चिता सजी हुई थी |राजकुमार ने सोचा कि आज तो उसे शीत ऋतू का कलेश नही सता रहा तो लोग चारो तरफ आग क्यों लगा रहे है|धीरे-धीरे आग पूरे शरीर को जला रही है |पूरा शरीर जल कर राख बन गया है |यह सब देख कर राजकुमार बहुत दुखी हुए |चन्ना से प्रश्न किया कि सभी की यही गति होती है चन्ना ने जवाब दिया कि हाँ राजकुमार जो जन्म लेता है उसकी म्रत्यु निश्चित है|और यह अटल सत्य है |राजकुमार ने चन्ना से कहा कि रथ महल की तरफ ले चलो|महल में पहुचने पर राजा ने देखा कि राजकुमार सिद्धार्थ निराश है | राजा समझ गए की संत आशित की आकाशवाणी सत्य होने जा रही है |राजा को अपने पुत्र की चिंता होने लगी |सिद्धार्थ को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था |

Gautam Buddha Biography In Hindi

महाप्रयाण,महाभिनिष्क्रमण का वक्त आ गया था |चैत्र पूर्णिमा की रात थी|चन्द्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा था ,धीरे -धीरे हवा चल रही थी| सिद्धार्थ अपने बिस्तर से उठे और पहले अपनी पत्नी यशोधरा को देखा फिर अपने प्यारे पुत्र राहुल को देखा |और वे अपने कार्य के लिए निकल पड़े पहले वे घुडसाल के पास पहुचे |घुड़साल के  पास ही चन्ना सोता था |चन्ना से कहा मेरा घोड़ा ले आओ|चन्ना ने कहा राजकुमार आप यह क्या कर रहे है |चन्ना  उन्हें नगर से थोड़ी दूर छोड़ आया| राजकुमार ने अपने आभूषण चन्ना को दे दिए और कहा आगे का रास्ता मै स्वयं तय करूँगा |चन्ना ने बहुत दुखी मन से अंतिम बिदाई दी|काफी दिनों तक सिद्धार्थ ने भिक्षा मांगी |

सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कलाम और रामपुत्र से योग साधना सीखी|अब वे उरुवेला पहुचे और वहा तपस्या की|सिद्धार्थ ने कुछ दिनों के लिए अन्न लेना बंद कर दिया जिससे वे बहुत कमजोर हो गए|लेकिन कुछ लोगों के मुख से बाते सुनी तो उन्होंने मान लिया की आहार से योग पूरा होता है किसी मार्ग के लिए मध्यम मार्ग अपनाया जा सकता है|और इसके लिए कठोर तपस्या करनी चाहिए|

Gautam Buddha ke Bare Mein Puri Jankari

वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल के पेड़ नीचे ध्यान लगा कर बैठे थे|पास के गाव की एक महिला सुजाता को पुत्र प्राप्त हुआ| उसने उसी पेड़ के नीचे मन्नत मागी थी | मन्नत पूरी होने पर थाली में गाय के ढूध से बनी खीर लाई | सिद्धार्थ वही ध्यान लगाये बैठे थे उस महिला ने उन्हें पीपल देवता समझ कर वह थाली उन्हें दी और कहा जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुयी है वैसे आपकी मनोकामना पूरी हो |

उसी रात जब सिद्धार्थ उस पेड़ के नीचे दोबारा ध्यान लगाया तो उन्हें उसी रात ज्ञान प्राप्त हुआ|उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से” बुद्ध” कहलाये| इन्ही  जिस पेड़ के नीचे ज्ञान मिला वह पेड़ ”बोधिवृक्ष”कहलाया|जहा उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह स्थान ‘‘बोधिगया’‘कहलाया| सारनाथ में उन्होंने ने पहला उपदेश दिया|उन्होंने पाच मित्रो को अपना अनुयायी बनाया| और वही अनुयायी धर्म का प्रचार प्रसार किया |

गौतम बुद्ध 80 वर्ष की आयु में परिनिर्वाण के लिए रवाना हुए |बुद्ध ने आख़िरी वक्त में एक लोहार के घर का खाना खाया था जिसके कारण वे बीमार पड़ गए |उन्होंने यह भी कहा कि इसका जिम्मेदार वह लोहार कुंडा नहीं है उसे माफ़ कर देना|

Gautam Buddha Ke Updesh

गौतम बुद्ध ने कहा कि दुःख है लेकिन उसे दूर करने का उपाय भी है उन्होंने दुःख ,उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग बताया|

  • अग्निहोत्र और गायत्रीमन्त्र का प्रचार-प्रसार
  • ध्यान
  • मध्यममार्ग का अनुसरण
  • चार आर्य सत्य
  • अष्टांग मार्ग

अष्टांगिक मार्ग :-

  • सम्यक दर्शन – सत्य ,असत्य ,पाप-पुण्य के भेदों को समझना |
  • सम्यक संकल्प -इच्छाओ का त्याग करना|
  • सम्यक वाणी -विनम्र वाणी बोलना ,किसी को दुःख न पहुचान
  • सम्यक कार्य -सदा अच्छे कार्य करना |
  • सम्यक आजीविका-जीवन जीने के लिए सही तरीके से धन कमाना |
  • सम्यक व्यायाम-बुरी सोच ,भावना से दूर रहना |
  • सम्यक स्मृति-अच्छे बातो का विचार करना |
  • सम्यक समाधी-एकाग्रता से विचार करना |

हिन्दू धर्म में वेदों का जो स्थान है वही स्थान बौद्ध धर्म में पिट्को का है|बौद्ध धर्म का प्रचार -प्रसार गौतम बुद्ध के शिष्यो ने किया |उनके शिष्यों ने बुद्ध के उपदेश को कंठस्थ करते फिर उसे लिख कर एक पेटिका में रख देते थे इसलिए उन उपदेशो को पिटक कहा जाने लगा| पिटक तीन है :-

  1. विनय पिटक
  2. सुत्त पिटक
  3. अभिधम्म पिटक

बौद्ध धर्म का प्रचार उनके शिष्यों ने किया |धीरे -धीरे  भिक्षुओ के संख्या बढ़ने लगी और राजा महराजा बौद्ध धर्म के अनुयायी बनने लगे |उन्होंने भिक्षुओ को रहने के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की|बौद्ध धर्म का प्रचार -प्रसार करने के लिए इन्ही भिक्षुओ को देश विदेश में भेजा|बौद्ध धर्म के प्रचार में सम्राट अशोक ने अहम् भूमिका निभायी|मौर्यकाल तक आते आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन ,जापान,मंगोलिया ,कोरिया ,श्री लंका में फैल चुका था

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