Chanakya Neeti On Dharma In Hindi | चाणक्य नीति : धर्म पर कथन

Chankya Neeti on DHARMA In Hindi

Chanakya Neeti On Dharma In Hindi | चाणक्य नीति : धर्म पर कथन

Chanakya Neeti On Dharma In Hindi : आज हम आपसे Chankya Neeti में Dharma पर कहे गए सभी श्लोंको का hindi में अर्थ बतायेंगे | Chankya के बताये गए ये नियम आपके लिए रामबाण सिद्ध होंगे |

Hy Friends , आज हम आपसे Chanakya Neeti को Hindi Language में Share करने जा रहे हैं | Chankya ने अपनी Chankya Neeti में Love, [Dushman],Student,Life,Woman,Dharma,Knoweldge आदि Topics को बहुत ही अच्छी प्रकार से हमें बताने की कोशिश की है , अगर हम चाणक्य की नीतियों का पालन करे तो हमारे सफल होने की सम्भावना बहुत ही ज्यादा बढ़ जाती है , क्योंकि इन्ही नीतियों के कारण चाणक्य ने मगध के राजा घनानंद को पराजित किया था | चाणक्य ने इन नीतियों का संस्कृत भाषा ने वर्णन किया है जिसका HINDI रूपान्तरण हम यहाँ आपको उपलब्ध करा रहे हैं तो चलिए पढ़ते हैं :Chanakya Neeti Dharma In Hindi

Chanakya Neeti In Hindi : Dharma

हम अपने चारों ओर अनेक प्रकार के धर्मों को देखते हैं। तो हमें यह अहसास होता है कि मानवता के साथ किसी धर्म का रिश्‍ता जुड़ा हुआ है। इसलिए अब हमें धर्म के बारे में सोचना ही पड़ेगा।

आचार्य चाणक्‍य ने जब मानव जाति के धर्म को बन्‍धनों में जकड़े देखा तो उन्‍होंने भी सोचा कि आज मानवता को धर्म के बारे में पूरा ज्ञान देना आवश्‍यक है।

  • सर्वप्रथम मैं तीनों लोकों के स्‍वामी भगवान विष्‍णु को प्रणाम करता हूँ, अनेक शस्‍त्रों से राजनीति विषय की बातों को इकट्ठा करके लोगों के हित की बातें कर रहा हूँ।
  • भगवान से मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि इन कठिन कार्य के लिए मेरी सहायता करें और मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं मानव जाति की भलाई के लिए कुछ कर सकूं। मेरे इस कार्य से पूरी मानवता की भलाई हो सके।
  • किसी भी श्‍लोक के आधे से मन को अथवा उससे भी आधे को प्रतिदिन मनन करना उचित है।
  • दान अध्‍ययन आदि से दिन को सार्थक बनाना चाहिए।
  • दान और ज्ञान : दोनों ही पुरूष के लिए बहुत जरूरी है। इन दोनों के करने से मनुष्‍य का मन लगा रहता है। उसका समय व्‍यर्थ नष्‍ट नहीं होता।
  • मनुष्‍य को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, इन चारों में से  किसी एक की प्राप्ति के लिए यदि प्रयत्‍न किया अथवा ऐसे कार्य न किए तो उसका मानव जन्‍म लेने का क्‍या लाभ है। ऐसे प्राणी का तो धरती पर आना ही बेकार है, यदि ऐसे लोग धरती पर आते भी है तो वे धरती के साथ-साथ अपने आप पर भी बोझ होते हैं। इनके जीवन और मृत्‍यु में कोई अन्‍तर नहीं होता।
  • जीवन का अर्थ यह है कि इसे सदा अच्‍छे काम में लगाए रखें। अच्‍छे भले ज्ञान के कामों से ही पुरूष महान बनता है।
  • यह मत भूलो कि यह जीवन अस्‍थाई है।
  • इसलिए इस जीवन के हर पल का उपयोग किसी अच्‍छे कार्य के लिए किया जाना चाहिए। यह जीवन अनमोल है।
  • मृत्‍यु ही तो इस जीवन का अन्‍त है। शरीर जिसको संभाल-संभाल कर प्राणी रखता हैं, उसी शरीर को एक दिन लोग जला देते हैं।
  • जब तक जीवन है, तब तक ही हर चीज है, हर चीज में आनन्‍द है, किन्‍तु जैसे ही मृत्‍यु आकर जीवन का अन्‍त कर देती है। इसके साथ ही हर चीज का अन्‍त हो जाता है। मृत्‍यु सबसे बलवान है। जीवन का कोई भरोसा नहीं। जब भी मौत चाहे इसे आकर दबोच लेती है।
  • सबसे बड़ा देवता आग है।
  • देवता प्राणियों के हृदय में प्रवेश करते है।
  • आम आदमी इन देवताओं को पत्‍थरकी मूर्तियॉं ही तो समझता  है। किन्‍तु प्रभु भक्‍त को पत्‍थ्‍र की मूर्तियों में ही प्रभु के दर्शन करते है। जो माने उसके लिए तो यह पत्‍थर है। उसे संसार में हर ओर ईश्‍वर ही ईश्वर नजर आता है।
  • सत्‍य ही सबसे महान है।
  • सत्‍य के लिए बाकी सब बेकार है।
  • यह सत्‍य है कि सूर्य व्‍याप्‍त है। यह भी सत्‍य है कि वायु चलती है। इस प्रकार से इस संसार की हर चीज केवल सत्‍य पर ही निर्भर है।
  • इसलिए प्राणी को मात्र सत्‍य से ही प्‍यार करना चाहिए। सत्‍य की शक्ति से ही वह हर स्‍थान पर विजय पा सकता है।
  • पुरूष आदि काल से ही चंचल है।
  • इस संसार में भगवान को छोड़ कर चीज अस्‍थाई है।
  • लक्ष्‍मी तो रमणी है। सदा नृत्‍य करती है यह धन रिश्‍ते-नाते, घर द्वार सब अस्‍थाई है। इनमें  से कोई किसी का साथ नहीं देता।

साथ क्‍या देता है ?

  • केवल धर्म ही जो अटल सत्‍य है। यह ज्ञान का भण्‍डार है। ज्ञान भी अस्‍थाई हैं। यह कभी प्राणी का साथ नहीं छोड़ता।
  • मनुष्‍य की सुनने की शक्ति सबसे महान होती है। वह सुनकर ही ज्ञान पाता है। वह सुनकर ही मोक्ष पाता है।
  • इस तरह के प्राणी हर अच्‍छी चीज केवल सुनकर ही ग्रहण करता है, अच्‍छा-बुरा दोनों ही को प्राणी सुनता है। किन्‍तु बुराई से दूर रहते हुए। उसे केवल अच्‍छाई और ज्ञान की बोली को ही सुनना चाहिए।
  • मृत्‍यु को सबसे बलवान माना गया है।
  • होनी को कोई टाल नहीं सकता, जो भी प्राणी के साथ होने वाला होगा वैसे ही उसकी बुद्धि और व्‍यवहार हो जाते हैं।
  • होनी का असर उसके शरीर पर पड़ता है। होनी को कोई टाल नहीं सकता। वह तो अटल है। इस संसार की कोई भी शक्ति उसे टाल नहीं सकती।
  • मौत को इस संसार की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। मौत इस संसार के हर जीवन को ले जाती है। संसार के नष्‍ट हो जाने पर भी केवल एक मौत का राज्‍य बाकी रह जाता है।
  • मौत कभी सोती नहीं। सदा जागती है। इसलिए मौत को कभी मत भूलो।
  • जहॉं जीवन है वहॉं मृत्‍यु अवश्‍य होगी, जीवन के पश्‍चात केवल मृत्‍यु।
  • इसलिए मृत्‍यु को हर समय याद रखें। बुराई से बचें अच्‍छा कार्य करें।
  • प्राणी जैसा काम करता है। वैसा ही उसे फल मिलता है।
  • इन कार्यों के कारण ही तो प्राणी इस संसार के माया जाल में फँसा रहता है। अच्‍छे बुरे काम।
  • और जब मौत आती है तो यह सब कुछ यहीं पर रह जाता है।
  • कुछ भी तो प्राणी के साथ नहीं जाता। यदि पुरूष के साथ जाता है तो केवल उसके कर्म।
  • इस संसार में केवल धर्म ही प्रधान है।
  • कर्म फल ही प्राणी को मिलता है।
  • जब प्राणी इस बात को अच्‍छी तरह जानता है कि मरने के बाद उसे अपने कर्मों का फल मिलेगा तो फिर वह अच्‍छे कर्म क्‍यों नही करता है।
  • दूसरों का भला चाहने वाले ही तो आत्मिक शांति प्राप्ति कर सकते है।
  • इन्द्रियों पर संयम और जीवों पर दया करने से ही शुद्धि होती है।
  • कर्म से ही इन्‍सान छोटा बड़ा बनता है।
  • इसलिए सदा अच्‍छे कर्म करो। बुराई से दूर रहो। कर्म अच्‍छे करने से ही शांति मिलेगी, सुख मिलेगा।
  • जिस तरह से फूलों में खुशबू। तिलों में तेल। लकड़ी में आग। दूध में घी। ईख में मीठा रस।
  • इन सब चीजों का बाहर से देखकर आप इनके गुणों का अन्‍दाज नहीं लगा सकते, क्‍योंकि यह गुण बाहर से दिखाई नहीं देते।  इन गुणों के पहचानने के लिए बुद्धि की आवश्‍यकता होती है।
  • ठीक इस तरह से मानव शरीर में आत्‍मा का निवास होता है।
  • इसी आत्‍मा को हम शरीर से अलग करके नहीं पहचान सकते है। केवल अपने विचारों से ही इसकी परख कर सकते है।
  • इसीलिए सबसे पहले अपनी आत्‍मा को ही पहचानों, प्राणी से अधिक आत्‍मा महान है।

देवता कहॉं है ?

  • क्‍या इन मिट्टी की मूर्तियों में अथवा  ऊँचे मन्दिरों में देवता विराजमान है।
  • नहीं यह केवल हमारा बहम हैं।
  • देवता तो केवल हमारी आत्‍मा हमारी भावनाओं में बसे हुए हैं। भावना और श्रद्धा का नाम ही देवता हैं आत्‍मा मन्दिर है।
  • जैसा ही आपकी भावनाएं होंगी, वैसी ही वेधना का रूप होगा, यह न भूलें कि यह सारा संसार केवल भावनाओं पर ही आधारित है।

आपकी भावनाएँ कैसी है ?

  • भावनाओं का ही प्रभाव जीवन के हर पहलू पर पड़ता है। जैसी किसी की भावना होगी वैसा ही फल मिलेगा। इसलिए अच्‍छा फल पाने के लिए अपनी भावनाओं को शुद्ध रखिए।
  • विषय भोग वासना सब बुराइयों की जड़ माने जाते है।
  • इसलिए इन बुराईयों को सदा अपने आप से दूर रखो। इनके स्‍थान पर दया, सत्‍य, प्रेम को अपने साथ रखो। जीवन का वास्‍तविक सुख पाना चाहते हो तो अपने को सदा बुराईयों से दूर रखें यह सुख अच्‍छी आदतों से ही मिलते है।
  • सोनें में कभी खुशबू नहीं होती।
  • ईश्‍वर के साथ किसी ने चन्‍दन का फूल खिलते नहीं देखा। चाँद कभी दिन में नहीं निकलता।
  • क्‍या विधाता इन सब कर्मों को बदल नहीं सकता था।
  • ऐसा करने के लिए क्‍या कोई विधाता को बुद्धि देने वाला नहीं था।
  • यह सोचकर आप अवश्‍य ही हैरान होंगे।
  • परन्‍तु। यह मत भूलें कि यह सब कुछ प्रकृति के नियमानुसार ही हो रहा है। इन नियमों का पालन विधाता को भी करना पड़ता है। इन्‍हीं नियमों के ऊपर प्रकृति भी चल रही है।

क्‍या कोई आकाश पर जा सकता है ?

  • वहॉं पर जाकर किसी से बातचीत की जा सकती है। अथवा आज तक कोई भी आकाश तक गया है।
  • यदि इन प्रश्‍नों का उत्‍तर नहीं में है तो फिर आप इन बातों की कल्‍पना कीजिए जिन लोगों ने धरती पर लौटकर सूर्य, चन्‍द्रमा, ग्रहण के बारे में सैकड़ों वर्ष पहले से ही हिसाब बताकर तिथियॉं बता दी। उन्‍हें आप क्‍या कहेंगे।  बुद्धिमान।
  • जी हॉं, ऐसे लोगों को हम केवल बुद्धिमान नहीं कहेंगे। यह मत भूलें कि बुद्धि बाजारों में नही बिकती, ईश्‍वर की देन है। विधाता के लिए लेख को कोई नहीं मिटा सकता।
  • ईश्‍वर महान है, सर्वशक्तिमान है।
  • इस संसार की सारी बाग डोर ईश्‍वर के हाथ में है।
  • ईश्‍वर ही राजा और दास और दास को राजा बना देता है। ईश्‍वर ही गरीब को अमीर और अमीर को गरीब बना देता है।
  • ईश्‍वर पर भरोसा रखो, वहीं सबका ख्‍याल रखता है।
  • जिस प्राणी की माता लक्ष्‍मी और पिता स्‍वयं भगवान हों, विष्‍णु के उपासक उसके भाई हों, तीनों लोक उसके लिए अपने देश के समान हो जाते है वह सदा सुखी रहता है।
  • यदि इस सारे संसार को चलाने वाला ईश्‍वर है।
  • तो मुझे अपने जीवन को कोई चिंता नहीं।
  • हॉं, यदि ऐसा विश्‍वास हो तो फिर नवजात शिशु के लिए मॉं के स्‍तनों में दूध कहॉं से आता है।
  • यह सब कुछ आपका है। आपके होते हुए मुझे किसी चीज की चिंता नही।
  • बस आप ही मुझ पर कृपा करो। मुझे इस संसार की हर बुराई से दूर रखो।
  • प्राणी को यह चार गुण जन्‍म से ही उपहार के रूप में मिलते हैं।
  • दान देने की शक्ति, मीठे बोल, धैर्य, धैर्य ज्ञान।
  • यह परिगुण प्राणी को अपने संस्‍कारों के साथ मिलते है।
  • यह गुण मनुष्‍य के किसी के कहने से नहीं मिलते, खरीदे नहीं जाते। यह तो सब ईश्‍वर की देन हैं।
  • कलियुग को इस संसार के विनाश का युग माना जाता है। चाणक्‍य जी के विचारों के अनुसार दो हजार पॉच सौ वर्ष बीत जाने पर ग्राम देवता, ग्राम छोड़ देते हैं, अर्थात ग्रामीणवासियों का धर्म-कर्म छूट जाता है।
  • कलियुग में अन्‍त काल में गंगा नहीं सूख जाती है और दस हजार वर्ष बीत जाने पर स्‍वयं विष्‍णु भगवान पृथ्‍वी छोड़ देते है।
  • यह सब चिन्‍ह इस बात के प्रतीक होते हैं कि अब महाप्रलय आने वाली है। महाप्रलय संसार का विनाश करती है। उस समय सारा संसार मिट जाता है। हर चीज का विनाश हो जाता है। यह होता है कलियुग का अन्‍त।
  • कलियुग के अन्‍त पर नए संसार का निर्माण होता है। यह क्रम न जाने कब से चला आ रहा है।
  • तीर्थ यात्रा, पूजा एवं तीर्थ स्‍नान। यह सब मन की खुशी के लिए होते हैं। तीर्थों पर जाना केवल अपने पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं। यहीं धारणा लेकर तीर्थ यात्रा करते हैं।
  • क्‍या आप समझते हैं। ऐसा करने से मनुष्‍य के पापों का बोझ हल्‍का हो जाता है।     नहीं।
  • जिस तरह शराद का पात्र जल दिए जाने पर भी शुद्ध नहीं माना जाता, वैसे ही तीर्थ स्‍थान पर जाकर, वहॉं स्‍नान करने से कभी पाप नहीं धुलता।
  • भोजन करते समय प्राणी को सदा मौन रहना चाहिए। मौन रहकर भोजन करना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए काफी लाभदायक माना जाता है। इस विषय में चाणक्‍य जी का मत है।
  • जो एक वर्ष तक मौन रहकर भोजन करता है। वह हजार कोटि वर्ष तक स्‍वर्गलोक में स्‍थान पाता है उसके लिए सुखों के सारे द्वार खुले रहते है।
  • जो ब्राह्मण प्राकृतिक रूप से पैदा हुए फलों और अन्‍य पदार्थो को खा पीकर, इस संसार से दूर जंगल में रहते हुए, भगवान की पूजा करता है। वहीं सच्‍चा भक्‍त, महापुरूष, सच्‍चा ब्राह्मण माना जाता है।
  • जो ब्राह्मण केवल एक समय भोजन खाकर सन्‍तुष्‍ट हो जाए, केवल मासिक धर्म की समाप्ति के पश्‍चात घर में स्‍त्री से एक बार सहवास करता है। वही ब्राह्मण विद्वान माना जाता है।
  • भूखे लोगों को खाना खिलाना, ब्राह्मणों को दान देने वाला प्राणी चाहे इसे कर्म ही करे, तब भी उसका फल बहुत अच्‍छा मिलता है। ईश्‍वर ऐसे लोगों से बहुत खुश रहते है।
  • जो प्राणी दान नहीं देता, भगवान की पूजा नहीं करता। साधु सन्‍तों का सम्‍मान नहीं करता, तीर्थ यात्रा नहीं करता, ऐसे लोगों को तो एक शव के बराबर ही समझ लेना चाहिए।
  • जो लोग, श्री भगवान की पूजा नहीं करते, मन्दिरों में जाकर शब्‍द कीर्तन नहीं सुनते, ऐसे लोगों का जीना व्‍यर्थ है।
  • उल्‍लू दिन में नहीं देख सकता, इसमें भला सूर्य का क्‍या दोष है। कदीन के पेड़ पर पत्‍ते नहीं आते न फूल खिलते हैं। इसमें बसन्‍त ऋतु का क्‍या दोष है।
  • चातक के मुँह में वर्षाकी एक बूंद नहीं गिरती इसमें भला बादल का क्‍या दोष है।
  • यूं समझ लो कि यह सब कुछ विधाता की ही देन है।
  • धर्म के कामों से सबसे आगे रहना, मीठे बोल बोलना, दान पुण्‍य करने को कर्तव्‍य समझना, ब्राह्मण का सम्‍मान करना, घर आये मेहमान की सेवा करना। यह सब गुण एक अच्‍छे पुरूष में होने चाहिए।
  • सम्‍पूर्ण मनोरथ पूरा करने वाला कल्‍पवृक्ष वास्‍तव में एक लकड़ी का होता है सोने का पहाड़ सुमेरु पर्वत केवल अचल पहाड़ होता है।
  • हीरे जवाहरात का बादशाह चिंता केवल एक पत्‍थर ही तो होता मनुष्‍य का इन चीजों पर कोई अधिकार नहीं।

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